गेंहूँ के पौधे (Wheatgrass) के रोगनाशक गुण कैंसर तक का उपचार जानिए

गेंहूँ के पौधे (Wheatgrass) में रोगनाशक ईश्वरप्रदत्त अपूर्व गुण

गेंहूँ के पौधे (wheatgrass) में शरीर का शोधन करने और उसे स्वस्थ रखने की अद्धभुत शक्ति है | अमरीका की एक महिला डॉक्टर ने गेंहूँ की शक्ति के सम्बन्ध में बहुत अनुसंधान तथा अनेकानेक प्रयोग करके एक बढ़ी पुस्तक लिखी है, जिस का नाम है “Why suffer ? The Answer? Wheat grass Manna!” इसकी लेखिका हैं, विख्यात प्राकृतिक चिकित्सक डॉ.एन.विगमोर D.D.N.D.; P.S.D.; P.W.D.; S.M.D. वगरैह | पुस्तक में उन्होंने अपने सब अनुसंधानों का पूरा विवरण दिया है | उन्होंने अनेकानेक असाध्य रोगियों को गेंहूँ के छोटे-छोटे पैधों का रस (Wheat Grass Juice) देकर उनके कठिन से कठिन रोग अच्छे किए हैं | वे कहती हैं कि संसार में ऐसा कोई रोग नहीं है जो इस रस के सेवन करने से अच्छा न हो सके | कैंसर के बड़े-बड़े भयंकर रोगियों को उन्होंने अच्छा किया है, जिन्हें डाक्टरों ने असाध्य समझकर जबाव दे दिया था और वे मरणप्राय : अस्पताल से निकाल दिए गए थे | ऐसी हितकर चीज यह अदभुत (Wheat Grass Juice) साबित हुई है | अनेकानेक भगंदर, बवासीर, मधुमेह, गठियावाय, दमा, खाँसी वगैरह के पुराने असाध्य रोगी उनहोंने एक साधारण रस से अच्छे किये हैं | बुढ़ापे की कमजोरी दूर करने में तो यह रामबाण ही है | भयंकर फोड़ों और घावों पर इसकी लुगदी बाँधने से जल्दी लाभ होता है | अमेरिका के अनेकानेक बड़े-बड़े डॉक्टरों ने इस बात का समर्थन किया है और अब बंबईव गुजरात प्रान्त में भी अनेक लोग इसका प्रयोग करके लाभ उठा रहे हैं |

गेंहूँ के पौधे का महत्त्व : (दैनिक हिंदुस्तान 18-12-1977) : भारत में आयोजित विश्व शाकाहारी कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के लिए डॉ. विगमोर आईं | हमारे प्रश्न किए जाने पर कि गेंहूँ के पौधे (Wheatgrass) के रस के पीछे क्या सिद्धांत हैं ? डॉ. बिगमोर ने कहा कि सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि बीमारी क्या है ? हममें से अधिकांश लोग अनुचित खाद्य वस्तुओं और खाने के अनुचित तरीकों के द्वारा जीवन भर अपने शरीर का दुरूपयोग करते रहते हैं | इस दुरूपयोग के कारण हमारे शरीर में सब प्रकार का विष जमा हो जाता है |

गेंहूँ के पौधे (Wheatgrass) के गुणों पर प्रकाश डालते हुए डॉ. विगमोर ने कहा कि गेंहूँ के पौधे में सर्वाधिक पोषक तत्त्व हैं | गेंहूँ पौधे जीवनदायी तत्त्व सबसे अधिक हैं | रासायनिक जाँच से ज्ञात हुआ कि गेंहूँ के पौधे का रस हमारे रक्त से बहुत मिलता-जुलता है | गेंहूँ के पौधे में मैगनेशियम अणु है, जबकि हमारे रक्त में लोहा | इस विशेषता के कारण गेंहूँ के पौधे का रस रक्त और नाड़ियों के शोधन में अत्यन्त उपयोगी है |

कैंसर का उपचार : गेंहूँ का पौधा (Wheatgrass) कैंसर (Cancer) के उपचार में किस प्रकार सहायक है ? डॉ. विगमोर ने कहा – कैंसर भी शरीर की एक स्थिति मात्र है, जो यह बताती है कि इस अदभुत यन्त्र में कही कोई खराबी है | प्रकृति सदा शरीर को सन्तुलन में रखने का प्रयत्न करती है | कुछ लोग कैंसर से पीड़ित होते हैं और कुछ को अन्य बीमारियाँ, यह इसलिए कि सबके जीवन जीने का ढंग अलग-अलग है | एक महिला की छाती में कैंसर था | सब प्रकार की चिकित्सा करा कर वह निराश हो चुकी थी | उसको सब प्रकार को रसों का आहार दिया गया गया और कुछ महीनों में वह ठीक हो गई | इसी प्रकार एक ल्यूकीमिया के मरीज को पानी का एनिमा देकर पेट साफ किया और बाद में एनिमा से ही आँतों में गेंहूँ के पौधे का रस पहुँचाया और वह ठीक हो गया | नगरों में निरन्तर प्रदूषण बढ़ रहा है | गेंहूँ के पौधे में प्रदूषण विरोधी तत्त्व हैं और इसके सेवन से कैंसर और अन्य रोगों से बचा जा सकता है |

इस रस को लोग Green Blood की उपमा देते हैं | कहते हैं कि यह रस मनुष्य के रक्त से 40 फीसदी मेल खाता है | ऐसी अदभुत औषधि आज तक कही देखने में नहीं आयी थी | इसके तैयार करने की विधि बहुत ही सरल है | प्रत्येक मनुष्य घर में इसे आसानी से तैयार कर सकता है |

रस बनाने की विधि : आप 10-12 चीड़ के टूटे-फूटे बक्सों में, बाँस की टोकरी में अथवा मिटटी के गमलों में मिटटी भर कर उसमें प्रतिदिन बारी-बारी से आधी मुट्ठी उत्तम गेंहूँ के दाने बो दीजिए और छाया में अथवा कमरे या बरामदे में रख कर यदाकदा थोड़ा-थोड़ा पानी डालते जाइये, धुप न लगे तो अच्छा है | जिस मिटटी में गेंहूँ बोया जाय उसमें अधिक खाद नहीं होना चाहिए | तीन चार दिन बाद पौधे उग आयेंगे और आठ-दस दिन में 7-8 इंच के हो जायेंगे तब आप उसमें से पहले दिन बोए हुए सारे पौधे जड़ सहित उखाड़कर जड़ को काट कर फेंक दीजिए और बचे हुए डण्ठल और पत्ती को (जिसे Wheat Grass कहते हैं) धोकर साफ सिल पर थोड़े पानी के साथ पीसकर आधे गिलास के लगभग रस छान कर तैयार कर लीजिए और रोगी को तत्काल वह ताजा रस रोज सवेरे भूखे पेट पीला दीजिए | इसी प्रकार शाम को भी ताजा रस तैयार करके पिलायें | फिर दो घंटे तक कुछ नहीं खायें भोजन सादा, बिना तला भुना लें | बस आप देखेंगे की भयंकर रोग आठ-दस या पन्द्रह-बीस दिन बाद भागने लगेंगे और दो-तीन महीने में वह मरणप्राय: प्राणी एकदम रोगमुक्त होकर पहले के समान हट्टा-कट्टा स्वस्थ मनुष्य हो जायेगा | रस छानने में जो फूजला निकले उसे भी आप नमक डालकर भोजन के साथ खालें तो बहुत अच्छा है | रस निकालने के के झंझट से बचना चाहें तो आप उन पौधों को चाकू से महीन-महीन काट कर भोजन सलाद की तरह भी सेवन कर सकते हैं, परन्तु उसके साथ कोई फल न मिलाये जायें | साग-सब्जी मिलाकर खूब शौक से खाइये |

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